हंगामे के कारण सदन नहीं चलने पर हर घंटे स्वाहा हो जाते हैं डेढ़ करोड़ रुपये

कल यानी बीते सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ। सत्र का पहला ही दिन न सिर्फ पिछले साल की तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया बल्‍कि यह अहसास भी करा गया कि आगे क्‍या होने वाला है, हालांकि सत्र से पहले औपचारिक रूप से सरकार और विपक्षी पार्टियां एक-दूसरे को मर्यादा का पाठ पढ़ाती हैं ताकि संसद की कार्यवाही सुनिश्चित की जा सके और कुछ कार्य हो सके लेकिन उस पर अमल कोई नहीं करता।

नाली में बह रहा है पब्‍लिक का पैसा

आप इसके लिए भुगतान करते हैं: संसद सत्र के हर एक मिनट के लिए आपको 2.5 लाख रुपये अदा करने पड़ते हैं (जो कि 2012 में था, अब इसकी लागत बहुत ज्यादा है)। अब इसकी लागत है 1.5 करोड़ रुपये प्रति घंटे और 9 करोड़ रुपये प्रति दिन है (अगर एक दिन में 6 घंटे का कार्य करना माना जाए)। सत्र के हंगाने की भेंट चढ़ जाने का मतलब है कि आपका पैसा नाली में बह गया।

सदन के हंगामे में बर्बाद हो जाती है आपकी गाढ़ी कमाई?आपका पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता है, संसद में बर्बाद हुए समय के लिए भी आप पैसे अदा करते हैं। यहां देखिए यह आपकी जेब पर कितना भारी पड़ता है:

दो घंटे कार्य नहीं हुआ = तीन करोड़ रूपये = झामुमो घूस कांड (1995)

एक दिन कार्य नहीं हुआ = सात करोड़ रुपये = चारा घोटाला (1990)

दो दिन कार्य नहीं हुआ = 20 करोड़ रुपये = एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी घोटाला (1987)

तीन दिन कार्य नहीं हुआ = 32 करोड़ रुपये = यूटीआई घोटाला (2001)

सात दिन कार्य नहीं हुआ = 64 करोड़ रुपये = बोफोर्स घोटाला (1987)

15 दिन कार्य नहीं हुआ = 133 करोड़ रुपये = यूरिया घोटाला (1996)

इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इस पर खुद विचार कीजिए।

-updarpan.com