तुर्की ने चीन के सामने वीगर मुसलमानों का मसला उठाया

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ फ़ोन पर बातचीत में वीगर मुसलमानों का मसला उठाया.
उन्होंने चीनी राष्ट्रपति से कहा कि तुर्की के लिए ये महत्वूपर्ण है कि वीगर मुसलमान ”चीन के समान नागरिकों” के तौर पर शांति से रहें लेकिन उन्होंने कहा कि तुर्की चीन की राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करता है.
न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से इस बातचीत को लेकर एक बयान जारी किया गया, जिसमें बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मसलों पर भी बात हुई.
चीन पर प्रताड़ना के आरोप
चीन पर वीगर मुसलमानों को हिरासत में रखने और उन्हें प्रताड़ित करने के आरोप लगते रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और मानवाधिकार समूहों के अनुमान के मुताबिक़ दस लाख से भी ज़्यादा, मुख्यतौर पर तुर्की बोलने वाले वीगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को हाल के सालों में चीन के पश्चिमी शिनजियांग इलाक़े में निगरानी कैंपों में रखा गया है.
चीन ने शुरुआत में इन निगरानी शिविरों के होने से इंकार किया था लेकिन बाद में कहा कि वो वोकेशनल सेंटर हैं और आतिवाद से लड़ाई के लिए बनाए गए हैं. हालांकि, चीन ने प्रताड़ना के सभी आरोपों से इंकार किया है.
तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय के बयान के मुताबिक़ ”अर्दोआन ने कहा कि तुर्की के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वीगर तुर्क चीन के समान नागरिकों के रूप में समृद्धि और शांति से रहें. उन्होंने चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए तुर्की के सम्मान की बात भी की.”
इसके अलावा अर्दोआन ने शी जिनपिंग से कहा कि तुर्की और चीन के बीच वाणिज्यिक और राजनयिक संबंधों को लेकर बड़ी संभावनाएं हैं,
दोनों नेताओं ने ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों पर चर्चा की.
तुर्की ने उठाई थी आवाज़
दिलचस्प है कि चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ उसकी क्रूरता को लेकर मुस्लिम देशों में ख़ामोशी रहती है. पहली बार तुर्की ने 2019 में 10 फ़रवरी को चीन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी और कहा था कि चीन ने लाखों मुसलमानों को नज़रबंदी शिविर में बंद रखा है. तुर्की ने चीन से उन शिविरों को बंद करने की मांग की थी. हालाँकि इसके बाद अर्दोआन सरकार तेवर भी इस मामले में नरम पड़ता गया.
तुर्की के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हामी अक्सोय ने कहा था कि चीन का यह क़दम मानवता के ख़िलाफ़ है. तुर्की के अलावा दुनिया के किसी भी मुस्लिम देश ने चीन के इस रुख़ के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई थी.
पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर कई चरमपंथी संगठन हैं लेकिन ये चरमपंथी संगठन भी चीन के ख़िलाफ़ शायद ही कोई बयान देते हैं.
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान से भी चीन में मुसलमानों को नज़रबंदी शिविरों में रखे जाने पर सवाल पूछे गए थे तो उन्होंने चीन का बचाव किया था. सलमान ने कहा था, ”चीन को आतंकवाद के ख़िलाफ़ और राष्ट्र सुरक्षा में क़दम उठाने का पूरा अधिकार है.” सलमान ने इसे आतंकवाद और अतिवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई क़रार दिया था.
अर्दोआन सरकार पर दबाव
चीन में वीगर मुसलमानों को हिरासत में रखने का मसला तुर्की में भी उठता रहा है. विपक्षी दल चीन से रिश्तों को लेकर अर्दोआन सरकार की आलोचना करते रहे हैं.
पिछले साल चीन और तुर्की के बीच प्रत्यर्पण संधि पर सहमति बनने के बाद तुर्की में रहने वाले 40,000 वीगर मुसलमानों ने चीन को लेकर तुर्की के रवैये की आलोचना की थी.
तुर्की के विदेश मंत्री ने मार्च में कहा था कि यह समझौता उसी तरह का है जैसा तुर्की ने अन्य देशों के साथ किया है. उन्होंने इस बात से इंकार किया था कि इस समझौते के तहत वीगर मुसलमानों को चीन वापस भेजा जाएगा.
इस साल मार्च में जब चीन के विदेश मंत्री वांग यी तुर्की के दौरे पर आए तो हज़ारों वीगर मुसलमानों ने चीन में वीगर अल्पसंख्यकों को लेकर वो रहे व्यवहार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था.
इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने ‘तानाशाह चीन’, ‘वीगर नरसंघार रोको’ और ‘शिविर बंद करो’ के नारे लगाए. कुछ लोगों ने पूर्वी तुर्कीस्तान के स्वतंत्रता अभियान के नीले और सफेद झंडे भी लहराए थे.
तब तुर्की ने चीनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत के दौरान भी वीगर मुसलमानों का मसला उठाया था.
तुर्की में विपक्ष के नेताओं ने सरकार पर चीन के साथ अन्य हितों के चलते वीगर मुसलमानों के अधिकारों को अनदेखा करने का आरोप लगाया था. हालांकि, सरकार ने इससे इंकार किया था.
अप्रैल में तुर्की ने चीन के राजदूत को तलब भी किया था. तब चीनी दूतावास ने कहा था कि उसे वीगर मुसलमानों को लेकर चीन की आलोचना करने वाली विपक्षी नेताओं को जवाब देने का अधिकार है.
चीन के पलटवार का डर
पाकिस्तान पीएम इमरान ख़ान ने तो तक कहा है कि पश्चिमी मीडिया ने चीन में वीगर मुसलमानों के मामले को सनसनीख़ेज बनाकर पेश किया है.
ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटी में चाइना पॉलिसी के एक्सपर्ट माइकल क्लार्क मुस्लिम देशों की ख़ामोशी का कारण चीन की आर्थिक शक्ति और पलटवार के डर को मुख्य कारण मानते हैं. क्लार्क ने एबीसी से कहा है, ”म्यांमार के ख़िलाफ़ मुस्लिम देश इसलिए बोल लेते हैं क्योंकि वो कमज़ोर देश है. उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना आसान है. म्यांमार जैसे देशों की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 180 गुना ज़्यादा बड़ी है. ऐसे में आलोचना करना भूल जाना अपने हक़ में ज़्यादा होता है.”
मध्य-पू्र्व और उत्तरी अफ़्रीका में चीन 2005 से अब तक 144 अरब डॉलर का निवेश किया है. इसी दौरान मलेशिया और इंडोनेशिया में चीन ने 121.6 अरब डॉलर का निवेश किया. चीन ने सऊदी अरब और इराक़ की सरकारी तेल कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा है. इसके साथ ही चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना बन बेल्ट वन रोड के तहत एशिया, मध्य-पूर्व और अफ़्रीका में भारी निवेश का वादा कर रखा है. ईरान में भी चीन भारी निवेश करने की डील की है.
चीन में वीगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर अमरीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देश बोलते रहे हैं लेकिन मुस्लिम देश ख़ामोश रहना ही ठीक समझते हैं.
पाकिस्तान वीगरों पर चुप म्यांमार पर मुखर
कई इंटरव्यू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से पूछा गया कि वो चीन में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार पर कुछ बोलते क्यों नहीं हैं तो वो असामान्य रूप से ख़ामोश रह जाते हैं. क्रिकेटर से पाकिस्तान के पीएम बने इमरान ने कहा था कि वो इस बारे में बहुत नहीं जानते हैं. दूसरी तरफ़ इमरान ख़ान म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार की निंदा कर चुके हैं.
पाकिस्तान और चीन की दोस्ती जगज़ाहिर है. चीन पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के तहत 60 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान पर चीन के अरबों डॉलर के क़र्ज़ भी हैं. तीसरी बात ये कि पाकिस्तान कश्मीर विवाद में चीन को भारत के ख़िलाफ़ एक मज़बूत पार्टनर के तौर पर देखता है. ऐसे में पाकिस्तान चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ चुप रहना ही ठीक समझता है.
दुनिया भर के मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी और पाकिस्तान पूरे मामले पर ख़ामोश रहे हैं. दूसरी तरफ़ ये देश रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ म्यांमार में हुईं हिंसा की निंदा करने में मुखर रहे हैं.
-एजेंसियां