केसी जैन की रिट याचिका पर राज्य सूचना आयोगों को सुप्रीम कोर्ट का नोट‍िस

आगरा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनहित याचिका में सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के प्रभावी कार्यान्वयन के विभिन्न पहलूओं को लेकर देश के 28 राज्य सूचना आयोगों एवं सभी राज्य सरकारों को अभी हाल में नोटिस जारी किये गये हैं। यह याचिका आगरा के अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट केसी जैन द्वारा दायर की गयी। यह आदेश तीन न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा दिनांक 20.04.2021 को जनहित याचिका (सिविल) सं0 360 वर्ष 2021 में किये गये।

याचिकाकर्ता अधिवक्ता जैन द्वारा बताया गया कि इस याचिका में यह मुद्दा विशेष रूप से उठाया गया है कि अधिकांश राज्य सूचना आयोगों द्वारा अपील और शिकायतों की सुनवाई व्यक्तिगत रूप से की जाती है जिसके लिए अपीलकर्ताओं व शिकायतकर्ताओं को लम्बी यात्रा करके सूचना आयोगों के कार्यालयों में सुनवाई हेतु स्वयं जाना पड़ता है।

इससे उन्हें तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और खर्चा भी होता है। यही कारण है कि जिन आवेदकों को सूचना प्राप्त नहीं हो पाती है उसमें से 90 प्रतिशत आवेदक तो सूचना आयोग पहुंच ही नहीं पाते हैं। याचिका में यह बात रखी गयी कि सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत सूचना प्राप्त करने के लिए निर्धनता रेखा के नीचे वाले व्यक्तियों को कोई शुल्क नहीं देना होता है एवं अन्य आवेदकों को मात्र रू0 10/- का शुल्क देना होता है लेकिन यदि उन्हें सूचना नहीं मिलती है तो राज्य सूचना आयोग में सुनवाई हेतु बड़ी रकम यात्रा व अन्य खर्चों में करनी पड़ती है। सूचना आवेदकों की इन कठिनाईयों को देखते हुए सूचना आयोगों को वर्चुअल सुनवाई की सुविधा भी देनी चाहिए जैसा कि केन्द्रीय सूचना आयोग एवं छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में सुविधा है।
राज्य सूचना आयोगों में वर्चुअल सुनवाई की सुविधा न होने के कारण अधिनियम कमजोर हो गया है। डिजीटल युग में वर्चुअल सुनवाई न होना खेदपूर्ण है। उक्त के परिप्रेक्ष्य में याचिकाकर्ता अधिवक्ता जैन ने यह मांग सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी है कि सभी सूचना आयोगों के द्वारा वर्चुअल सुनवाई का विकल्प भी दिया जाना चाहिए।

याचिका में यह बिन्दु भी उठाया गया है कि राज्य सूचना आयोगों के डिजीटल पोर्टल आधे-अधूरे हैं जिनमें सभी सुविधाऐं उपलब्ध होनी चाहिए। पोर्टल के माध्यम से ऑननलाईन आरटीआई अपील व शिकायतें दर्ज करने की सुविधा हो, पोर्टल में यह भी दिखाना चाहिए कि दायर की गयी अपील या शिकायत का क्या स्थिति (स्टेटस) है, प्रत्येक मामले में सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश, वादसूचीयां व वार्षिक रिपोर्टें भी पोर्टल पर दिखनी चाहिए।

सूचना आयोग द्वारा अपील व शिकायतों को निश्चित समयावधि में (जो कि 4 माह होनी चाहिए) निर्णित होनी चाहिए। वर्तमान में सूचना आयोगों द्वारा अपीलों व शिकायतों का निर्णय प्रायः कई वर्षों में होता है जिससे अपील व शिकायत का प्रयोजन भी निष्फल हो जाता है।

याचिका में एक अन्य महत्वपूर्ण मांग यह भी उठायी गयी कि प्रत्येक राज्य सूचना आयोग के मुख्य राज्य सूचना आयुक्त द्वारा ये मानक भी निर्धारित किये जायें कि प्रत्येक सूचना आयुक्त द्वारा प्रति कार्यशील दिवस में कितने मामलों का निर्णय किया जायेगा। ऐसे मानक यदि बना दिये जाते हैं तो सूचना आयुक्तों द्वारा प्रकरणों के निस्तारण में तेजी आ सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह मांग भी की गयी है कि राज्य सूचना आयोगों द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 25 (1) के अन्तर्गत वार्षिक रिपोर्ट्स नियमित रूप से तैयार की जायें एवं राज्य सूचना आयोगों द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की स्थिति की विवेचना की जाए जैसा कि अधिनियम की धारा 25(5) के अन्तर्गत किया गया है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि जिन जन सूचना अधिकारियों द्वारा सूचनाऐं नहीं दी जाती हैं उन पर अधिनियम की धारा 20(1) के अन्तर्गत दण्ड लगाया जाये जिसकी वसूली भी हो। यही नहीं, शिकायतकर्ताओं को अधिनियम की धारा 19(8)(ख) के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति भी दिलायी जाये।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका में केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों को भी नोटिस जारी किये गये हैं। राज्य सूचना आयोगों की समुचित व्यवस्था करने व बजट देने का जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ही है।

अधिवक्ता जैन द्वारा कहा गया कि यह रिट याचिका सूचना अधिकार अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कारगर सिद्ध होनी चाहिए और जो ढिलाई जन सूचना अधिकारियों के द्वारा समय से सूचना न देने या आधी-अधूरी सूचना देने में की जाती है उस पर अंकुश लग सकेगा और पारदर्शिता कानून सफल बन सकेगा।
– updarpan.com