कल है चैत्र अमावस्या: पितरों के लिए करें धूप-ध्यान

रविवार, 11 अप्रैल और सोमवार, 12 अप्रैल को चैत्र मास की अमावस्या है। हिन्दी पंचांग में एक माह के दो भाग शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं।

शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएं बढ़ती हैं यानी चंद्र बढ़ता है। कृष्ण पक्ष में चंद्र घटता है और अमावस्या पर पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है। चंद्र की सोलह कलाओं में सोलहवीं कला को अमा कहा जाता है।

अमावस्या के संबंध में स्कंदपुराण में लिखा है कि-

अमा षोडशभागेन देवि प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देहिनां देहधारिणी।।

अर्थ– चंद्र की एक महाकला का नाम है अमा। इस कला में चंद्र की सभी सोलह कलाओं की शक्तियां होती हैं। इस कला का न तो क्षय और न ही उदय होता है।

जब किसी एक राशि में सूर्य और चंद्र साथ होते हैं, तब अमावस्या तिथि रहती है। 11 अप्रैल को सूर्य और चंद्र मीन राशि में रहेंगे। 12 अप्रैल की सुबह करीब 11 बजे मेष राशि में चंद्र प्रवेश करेगा। अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने गए हैं।

अमावस्या पर पितर देवताओं की तृप्ति के लिए तर्पण, श्राद्ध कर्म, धूप-ध्यान और दान-पुण्य करने का महत्व है। अमावस्या पर किसी पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन मंत्र जाप, तप और व्रत करने की परंपरा है। अगर किसी नदी में स्नान करने नहीं जा पा रहे हैं तो अपने घर पर ही पवित्र नदियों का ध्यान करते हुए स्नान करें और जरूरतमंद लोगों को धन-अनाज का दान करें।

पं. शर्मा के अनुसार जिन लोगों का जन्म अमावस्या पर हुआ है, उन लोगों को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है। आत्मविश्वास की कमी हो सकती है। इन लोगों को सोच-समझकर काम करना चाहिए, लापरवाही से बचें। तनाव से बचने के लिए रोज सुबह जल्दी उठें और सूर्य को जल चढ़ाकर दिन की शुरुआत करें। चंद्र के लिए शिवलिंग पर दूध चढ़ाना चाहिए।