शुरू हुआ रमजान का दूसरा अशरा, मोक्ष के लिए किया जाता है 11वां रोजा

मगफिरत यानि मोक्ष की बात हरेक मजहब में कही गई. यानि अगर आपको मोक्ष चाहिए तो आपको देवी देवता की आराधना पड़ती है.बता दें, जैसे जैन धर्म में मोक्ष (मगफिरत) के लिए ‘रत्न-त्रय’ (सम्यक ज्ञान-दर्शन-चारित्र), सनातन धर्म में ‘सदाचार’, ईसाई मजहब में ‘हॉली ड्यूटीज एंड मर्सी’ को अहमियत है तो बौद्ध धर्म में ‘अषृंगिक मार्ग’ पर जोर दिया गया है. ऐसे ही इस्लाम धर्म में भी मगफिरत की अहमियतता है. रमजान के माह का 11वां रोजा है आज जिसका महत्व यहां जानें. 
 
इस्लाम मजहब में मगफिरत (मोक्ष) के लिए तक़्वा (संयम/सत्कर्म) जरूरी है. तक़्वा के लिए रोजा जरूरी है. रोजा यानी अल्लाह का वास्ता. रोजा यानी मगफिरत का रास्ता. रमज़ान के मुबारक माह के ग्यारहवें रोजे से मगफिरत का अशरा शुरू हो जाता है जो बीसवें रोजे तक रहता है. यानि रमजान का दूसरा अशरा शुरू हो गया है. ग्यारहवें रोजे से ही रमजान माह में मगफिरत का अशरा शुरू होता है.
 
इस दूसरे अशरे को मगफिरत का अशरा (मोक्ष का कालखंड) इसलिए कहा जाता है कि इसमें अल्लाह से मगफिरत यानि मोक्ष के लिए दुआ की जाती है. बिना किसी बुराई के यानी बुराई से बचते हुए रोजे में अल्लाह की इबादत की जाती है और माफी मांगते हुए मगफिरत की तलब की जाती है. पवित्र कुरआन के उनतीसवें पारे (अध्याय-29) की सूरह मुल्क की बारहवीं आयत (आयत नंबर-12) में ज़िक्र है…’बेशक जो लोग अपने परवर दिगार से बिना देखे डरते हैं, उनके लिए मगफिरत (मोक्ष) और अज़्रे-अज़ीम (महान पुण्य) मुकर्रर है.