पुण्‍यतिथि: आधुनिक हिन्दी साहित्य के शीर्ष निर्माता बालकृष्ण भट्ट

आधुनिक हिन्दी साहित्य के शीर्ष निर्माताओं में से एक बालकृष्ण भट्ट की आज पुण्‍यतिथि है। 03 जून 1844 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में जन्‍मे बालकृष्ण भट्ट की मृत्‍यु 20 जुलाई 1914 को हुई थी।
बालकृष्ण भट्ट को आज की गद्य प्रधान कविता का जनक माना जाता है। बालकृष्ण भट्ट एक सफल नाटककार, पत्रकार, उपन्यासकार और निबन्धकार थे। भट्ट जी ने निबन्ध, उपन्यास और नाटकों की रचना करके हिन्दी को एक समर्थ शैली प्रदान की। ये पहले ऐसे निबन्धकार थे, जिन्होंने आत्मपरक शैली का प्रयोग किया था। बालकृष्ण भट्ट को हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, बंगला और फ़ारसी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। इन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध रूपों में सेवा की।
लगभग बत्तीस वर्षों तक ‘हिन्दी प्रदीप’ का संपादन कर भट्टजी अपने विचारों का व्यक्तिकरण करते रहे। ये ‘भारतेन्दु युग’ की देदीप्यमान मौन विभूति होने के साथ-साथ ‘द्विवेदी युग’ के लेखकों के मार्ग-दर्शक और प्रेरणा स्त्रोत भी रहे।
बालकृष्ण भट्ट के पिता का नाम पंडित वेणी प्रसाद था। पंडित वेणी प्रसाद की शिक्षा की ओर विशेष रुचि रहती थी, साथ ही इनकी पत्नी भी एक विदुषी महिला थीं अतः बालकृष्ण भट्ट की शिक्षा पर बाल्यकाल से ही विशेष ध्यान दिया गया। प्रारंभ में इन्हें घर पर ही संस्कृत की शिक्षा दी गयी और 15-16 वर्ष की अवस्था तक इनका यही क्रम रहा। इसके उपरान्त इन्होंने माता के आदेशानुसार स्थानीय मिशन के स्कूल में अंग्रेज़ी पढना प्रारंभ किया और दसवीं कक्षा तक अध्ययन किया। विद्यार्थी जीवन में इन्हें बाईबिल परीक्षा में कई बार पुरस्कार भी प्राप्त हुए। मिशन स्कूल छोड़ने के उपरान्त यह पुनः संस्कृत, व्याकरण और साहित्य का अध्ययन करने लगे।
व्यावसायिक जीवन
कुछ समय के लिए बालकृष्ण भट्ट ‘जमुना मिशन स्कूल’ में संस्कृत के अध्यापक भी रहे, पर अपने धार्मिक विचारों के कारण इन्हें पद त्याग करना पड़ा। विवाह हो जाने पर जब इन्हें अपनी बेकारी खलने लगी, तब यह व्यापार करने की इच्छा से कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) भी गए परन्तु वहाँ से शीघ्र ही लौट आये और संस्कृत साहित्य के अध्ययन तथा हिन्दी साहित्य की सेवा में जुट गए। यह स्वतंत्र रूप से लेख लिखकर हिन्दी साप्ताहिक और मासिक पत्रों में भेजने लगे तथा कई वर्ष तक प्रयाग में संस्कृत के अध्यापक रहे। भट्टजी प्रयाग से ‘हिन्दी प्रदीप’ मासिक पत्र का निरंतर घाटा सहकर 32 वर्ष तक उसका सम्पादन करते रहे। ‘हिन्दी प्रदीप’ बंद होने के बाद ‘हिन्दी शब्दसागर’ का संपादन कार्य भी इन्होंने कुछ समय तक देखा पर अस्वस्थता के कारण इन्हें यह कार्य छोड़ना पड़ा।
हिन्दी साहित्य में स्थान
बालकृष्ण भट्ट का हिन्दी के निबन्धकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबन्धों के प्रारंभिक युग को निःसंकोच भाव से भट्ट युग के नाम से अभिहित किया जा सकता है। व्यंग्य विनोद संपन्न शीर्षकों और लेखों द्वारा एक ओर तो भट्टजी प्रताप नारायण मिश्र के निकट हैं और गंभीर विवेचन एवं विचारात्मक निबन्धों के लिए वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निकट हैं। भट्टजी अपने युग के न केवल सर्वश्रेष्ठ निबन्धकार थे अपितु इन्हें सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी का निबन्ध लेखक माना जाता है। इन्होंने साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, नैतिक और सामयिक आदि सभी विषयों पर विचार व्यक्त किये हैं। इन्होंने तीन सौ से अधिक निबन्ध लिखे हैं। इनके निबन्धों का कलेवर अत्यंत संक्षिप्त है तथा तीन पृष्ठों में ही समाप्त हो जाते हैं।
इन्होंने मूलतः विचारात्मक निबन्ध ही लिखे हैं और इन विचारात्मक निबन्धों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
व्यावहारिक जीवन से सम्बंधित
साहित्यिक विषयों से समबन्धित
सामयिक विषयों से सम्बंधित
हृदय की वृतियों पर आधारित
कृतियाँ
भट्टजी ‘भारतेंदु युग’ की देन थे और भारतेंदु मंडली के प्रधान सदस्य थे। प्रयाग में इन्होंने ‘हिन्दी प्रवर्द्धिनी’ नामक सभा की स्थापना की थी और ‘हिन्दी प्रदीप’ नामक पत्र प्रकाशित करते रहे। इसी पत्र में इनके अनेक निबन्ध दृष्टिगोचर होते हैं। ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ प्रयाग ने इनके कुछ निबन्धों का संग्रह ‘निबन्धावली’ नाम से प्रकाशित भी करवाया था।
निबन्ध संग्रह – साहित्य सुमन, भट्ट निबन्धावली।
उपन्यास- नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान।
नाटक- दमयंती स्वयंवर, बाल-विवाह, चंद्रसेन, रेल का विकट खेल।
अनुवाद- वेणीसंहार, मृच्छकटिक, पद्मावती।
-एजेंसियां