सबूत देने में नाकाम पाकिस्तान अभी FATF की ग्रे लिस्ट में ही रहेगा

नई दिल्‍ली। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में ही रखने का फैसला किया है। यह दावा पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्ट्स में किया गया है। पाकिस्तान ग्लोबल एंटी मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग बॉडी के सामने यह साबित करने में नाकाम साबित हुआ कि उसने आतंकवाद के खिलाफ सख्त और प्रमाणिक कार्यावाही की है। पाकिस्तान को कुल 27 मांगें पूरी करनी थीं। इनमें से 3 सबसे ज्यादा अहम थीं। इन्हें वह पूरा नहीं कर सका। वो 2018 से इस लिस्ट में है।

सबूत नहीं दे पाया पाकिस्तान
FATF में कुल 37 देश और 2 क्षेत्रीय संगठन हैं। पाकिस्तान को ग्रे से व्हाइट लिस्ट में आने के लिए कम से कम 12 सदस्य देशों के वोट चाहिए थे। पाकिस्तान को 27 शर्तें पूरी करनी थीं। 24 को लेकर ज्यादा परेशानी नहीं थी, क्योंकि इन पर अमल मुश्किल नहीं है। 3 को लेकर पेंच फंसा रह गया। इनका सार ये था कि पाकिस्तान को सिर्फ कार्रवाई ही नहीं करनी थी, बल्कि इसके बिल्कुल पुख्ता सबूत सदस्य देशों को दिखाना थे। फरवरी में भी वो ये नहीं कर पाया था और इस बार भी उम्मीद बहुत कम है।

अब ग्रे लिस्ट में रखने की कोई तुक नहीं
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने गुरुवार को मीडिया से बातचीत में दावा किया था कि उनका देश FATF की लगभग तमाम मांगों और शर्तों पर कार्रवाई कर चुका है और अब उसे ग्रे लिस्ट में रखने का कोई औचित्य नहीं है। कुरैशी ने कहा था- हमारे सामने 27 शर्तों की लिस्ट रखी गई थी। हमने उनमें से 26 शर्तों को पूरा कर दिया है। मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग पर जो डिमांड्स थीं, उन्हें तकनीकि तौर पर पूरा किया जा चुका है।

भारत पर आरोप
कुरैशी ने कहा था- हमने FATF की हर मांग पर फोकस किया और बहुत मजबूत तरीके से उन्हें पूरा किया। इसके बाद मुल्क को ग्रे लिस्ट में रखने की वाजिब वजह नहीं बनती। भारत इस मंच का इस्तेमाल सियासत के लिए कर रहा है। वो पाकिस्तान के खिलाफ प्रोपेगंडा कर रहा है। दुनिया जानती है कि हमने कितना अच्छा काम किया है। फरवरी में FATF की मीटिंग के पहले भी कुरैशी ने यही बातें कहीं थीं। इसके बावजूद पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में रखा गया था।

FATF की ग्रे और ब्लैक लिस्ट: इसमें आने के नुकसान

ग्रे लिस्ट : इस लिस्ट में उन देशों को रखा जाता है, जिन पर टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने या इनकी अनदेखी का शक होता है। इन देशों को कार्रवाई करने की सशर्त मोहलत दी जाती है। इसकी मॉनिटरिंग की जाती है। कुल मिलाकर आप इसे ‘वॉर्निंग विद मॉनिटरिंग’ कह सकते हैं।
नुकसान : ग्रे लिस्ट वाले देशों को किसी भी इंटरनेशनल मॉनेटरी बॉडी या देश से कर्ज लेने के पहले बेहद सख्त शर्तों को पूरा करना पड़ता है। ज्यादातर संस्थाएं कर्ज देने में आनाकानी करती हैं। ट्रेड में भी दिक्कत होती है।
ब्लैक लिस्ट : जब सबूतों से ये साबित हो जाता है कि किसी देश से टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग हो रही है, और वो इन पर लगाम नहीं कस रहा तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाता है।
नुकसान : IMF, वर्ल्ड बैंक या कोई भी फाइनेंशियल बॉडी आर्थिक मदद नहीं देती। मल्टी नेशनल कंपनियां कारोबार समेट लेती हैं। रेटिंग एजेंसीज निगेटिव लिस्ट में डाल देती हैं। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर पहुंच जाती है।

आतंकियों को मौके का इंतजार

फॉरेन पॉलिसी’ मैगजीन ने अप्रैल में जारी अपनी रिपोर्ट में FATF को एक तरह से वॉर्निंग दी थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ‘जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे कई आतंकी संगठनों पर सिर्फ दिखावे की कार्रवाई हुई है। अगर पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर किया जाता है तो कुछ ही वक्त में ये संगठन फिर खुलेआम हिंसा फैलाएंगे। अभी ये सिर्फ मौके का इंतजार कर रहे हैं। दुनिया पहले भी पाकिस्तान के झांसे में आ चुकी है।’
– एजेंसी