बॉलीवुड में आउटसाइडर की राह मुश्‍क‍िल, विशेष तौर पर हिंदी मीडियम वालों के लिए

मुंबई। अभिनेता पंकज त्रिपाठी का कहना है कि बॉलीवुड में आउटसाइडर की राह बहुत मुश्‍क‍िल है। खासकर तब जब आप गांव से आते हैं और आपने हिंदी मीडियम में पढ़ाई की है।
पंकत्र त्रिपाठी से ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ के सुल्‍तान से लेकर ‘मिर्जापुर’ के कालीन भैया तक अपनी दमदार अदाकारी से अलग पहचान बनाई है। सहज, बेहद सौम्‍य और जमीन से जुड़े हुए इंसान पंकज त्रिपाठी ने भले ही पॉपुलैरिटी बीते 9-10 साल में बटोरी हो लेकिन उनका सफर 14 साल का है। बॉलीवुड में एक आउटसाइडर होने का दर्द वह जानते हैं। पंकज त्रिपाठी का यही दर्द अब छलक उठा है।
‘आउटसाइडर्स को करना पड़ता है खूब स्‍ट्रगल’
पंकज त्रिपाठी ने सिर्फ गंभीर किरदार नहीं निभाए हैं। ‘फुकरे’ से लेकर ‘स्‍त्री’ में जहां कॉमेडी का तड़का लगाया है, वहीं ‘गुंजन सक्‍सेना: द कारगिल गर्ल’ से लेकर ‘मसान’ में एक संजीदा भूमिका निभाई है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्‍हें बहुत स्‍ट्रगल भी करना पड़ा है। पंकज कहते हैं कि इंडस्‍ट्री में आउटसाइडर्स की सफलता की राह इतनी आसान नहीं होती। उन्‍हें हालात से संघर्ष करना पड़ता है और यही सच्‍चाई है।
‘मुश्‍क‍िल बढ़ जाती है जब आप गांव से आते हैं’
पंकज त्रिपाठी ने अपनी बातचीत में कहा, ‘यह सच है कि इंडस्‍ट्री में नए एक्‍टर्स के लिए आसान राह नहीं होती। हां, यदि उनका इंडस्‍ट्री से कोई पुराना कनेक्‍शन है तो बात कुछ और होती है। बॉलीवुड में एक आउटसाइडर के लिए राह मुश्‍क‍िल होती है। यह राह तब और मुश्‍क‍िल हो जाती है कि जब आप किसी गांव से आए हैं और आपने हिंदी मीडियम स्‍कूल में पढ़ाई की है।’
किसान परिवार से हैं पंकज त्रिपाठी
बिहार के गोपालगंज जिले से ताल्‍लुक रखने वाले पंकज त्रिपाठी एक किसान परिवार से आते हैं। उन्‍होंने गांव से ही हाई स्‍कूल तक की पढ़ाई की और फिर पटना आ गए। पंकज ने हाजीपुर से होटल मैनेजमेंट की डिग्री ली और पटना के ही मौर्या होटल में काम करने लगे। कॉलेज के दिनों में ही थ‍िएटर में उनकी रुचि जगी और फिर 7 साल बाद उन्‍होंने दिल्‍ली के नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा में दाख‍िला लिया।
‘आप आर्ट से जुड़े रहिए, एक दिन फल जरूर मिलेगा’
पंकज त्रिपाठी अपने स्‍ट्रगल के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘अपने 14 साल के स्‍ट्रगल में मुझे अब यह विश्‍वास हो गया है कि किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण यह है कि यदि आप अपनी कला के साथ जुड़े रहते हैं, कला में विश्‍वास करते हैं तो एक न एक दिन यह आपको रिजल्‍ट जरूर देगी। मैं इसका गवाह हूं। इसलिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि आप खुद में विश्‍वास और आशा कभी न खोएं।’
-एजेंसियां