पुण्‍यतिथि विशेष: उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं परवीन शाकिर

24 नवम्बर 1952 को कराची (सिंध-पाकिस्‍तान) में जन्‍मी उर्दू कवयित्री सैयदा परवीन शाकिर का इंतकाल 26 दिसंबर 1994 के दिन पाकिस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद में हुआ।
पाकिस्तान सिविल सेवा की अधिकारी परवीन शाकिर ने खुली आँखों में सपना, ख़ुशबू, सदबर्ग, रहमतों की बारिश, ख़ुद-कलामी, इंकार (1990), माह-ए-तमाम (1994) आदि हैं।
वे उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी शायरी का केन्द्रबिंदु स्त्री रहा है।
फ़हमीदा रियाज़ के अनुसार वो पाकिस्तान की उन कवयित्रियों में से एक हैं जिनके शेरों में लोकगीत की सादगी और लय भी है और क्लासिकी संगीत की नफ़ासत व नज़ाकत भी। उनकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टीकेशन का दिलआवेज़ संगम है।
पाकिस्तान की इस मशहूर शायरा के बारे में कहा जाता है कि जब उन्होंने 1982 में सेंट्रल सुपीरयर सर्विस की लिखित परीक्षा दी तो उस परीक्षा में उन्हीं पर एक सवाल पूछा गया था जिसे देखकर वह आत्मविभोर हो गयी थीं।
परवीन शाकिर उर्दू अदब की सफ़ों में सबसे आगे नज़र आती हैं। एक ऐसी शायरा जिन्होंने औरत के ज़हन को अपनी शायरी में तब्दील कर दिया। उन्होंने मोहब्ब्त में जितना डूब कर लिखा उतनी ही शिद्दत से हिज्र के ग़म पर भी लिखा। उन्होंने एक प्रेमिका के एहसास कहे

बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिन
वो जानता था कि है एहतिमाम किस के लिए

तो एक पत्नी के तौर पर कहा कि-

यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है

वहीं उन्होंने अपने बेटे के लिए भी नज़्म कही जिसमें वह कहती हैं कि उसे यह ग़म न रहे कि वह एक शायरा का बेटा है बजाए एक पिता का बेटा होने के।

परवीन ने अलगाव पर भी ख़ूब कहा है-

हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न
बंद मुझ पर जब से उस के घर का दरवाज़ा हुआ

एक दोशीजा से लेकर किसी के मां हो जाने तक के सफ़र की बारीकी परवीन शाकिर के काव्य में मिलती है। लड़कियों के भीगते काजल से लेकर अपने महबूब की दुल्हन को सजाने तक का दर्द नज़र आता है। औरतों को केन्द्र में लेकर शायरी कहने वाली परवीन समूची ज़ात का प्रतिनिधित्व करती हैं।
24 नवंबर 1952 को पाकिस्तान के कराची में पैदा हुई परवीन शाकिर ने बहुत कम उम्र में ही लिखना शुरु कर दिया था। उन्होंने उर्दू अख़बारों और रिसालों के लिए बहुत लिखा। एक शायरा होने का साथ-साथ वह एक शिक्षक भी थीं और इसके बाद पाकिस्तान सरकार की सिविल सेवा में अधिकारी नियुक्त हो गयीं।
परवीन का शादी पाकिस्तान डॉक्टर सैयद नसीर अली से हुई थी लेकिन इसका अंत तलाक़ के साथ होना था। इस तलाक़ के कुछ ही वक़्त बाद 26 दिसंबर 1994 को एक कार दुर्घटना में परवीन की मृत्यु हो गयी। जिस सड़क पर वह दुर्घटना हुई उसे परवीन शाकिर रोड के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने ख़ुशबू, ख़ुदकलामी, इंक़ार, सदबर्ग जैसे संग्रह लिखे। परवीन को पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ‘प्राइड ऑफ़ परफ़ोर्मेंस’ से सम्मानित किया गया था।
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