हर‍िशंकर परसाईं जी के शब्दों में देख‍िए मुक्त‍िबोध को

सुप्रसिद्ध कवि , लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध की जंयती आज

मुक्तिबोध के बारे में हरिशंकर परसाई ने क्या खूब ल‍िखा है कि जैसे ज़िंदगी में मुक्तिबोध ने किसी से लाभ के लिए समझौता नहीं किया, वैसे मृत्यु से भी कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। ऐसी ही शख्श‍ियत मुक्त‍िबोध अर्थात् गजानन माधव मुक्त‍िबोध का आज जन्म द‍िन है ज‍िसे सभी अपने अपने ह‍िसाब से याद कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़के रायपुर में तो मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह में साहित्यिक पुस्तकों का स्टाल लगाया जा रहा है।

आज से रायपुर के मुक्ताकाशी मंच में सुप्रसिद्ध कवि , लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध का जंयती 13 नवबंर से प्रारंभ हो रहे पांच दिवसीय राष्ट्रीय मुक्तिबोध नाट्य समारोह के अवसर पर संस्कृति विभाग परिसर में साहित्यिक पुस्तकों का स्टाल लगाया जा रहा है जिसमे उपन्यास कहानी नाटक कविता की किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध रहेगी । प्रभात बुक सेंटर मुंबई के शरद मिश्र साहित्यिक किताबों के साथ उपलब्ध रहेंगे ।

प्रभात बुक सेंटर मुंबई पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान है और साथ- साथ हिन्दी पुस्तकों का वितरण भी करते हैं, शरद मिश्र के पिताजी ने इसकी की शुरुआत 11 अक्टूबर 1968 शुरू की थी और आज इनके प्रकाशन संस्थान को 50 साल हो गये है। इनका उद्देश्य (लक्ष्य) यही है की हिन्दी पुस्तकें महराष्ट्र के अलावा दूसरे शहरों में भी जा सके।

शरद मिश्र ने सन 1984 से इस कार्य की शुरुआत की और आज उन्हे संभालते हुए 35 साल हो गए, उनकी कोशिश रहती है की हिंदी पुस्तके ज्यादा से ज्यादा पाठक हिंदी किताबे पढ़े, नाट्य समारोह, सेमिनार, कवी सम्मलेन, लिटरेचर फेस्टिवल, और जितने भी साहित्यिक कार्यक्रम होते है यहाँ पर इनके द्वारा हिंदी पुस्तकों का स्टाल लगाया जाता है।

पढ़‍िए उनकी एक लंबी कव‍िता – जब दुपहरी ज़िन्दगी पर…

जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज
एक जॉबर-सा
बराबर रौब अपना गाँठता-सा है
कि रोज़ी छूटने का डर हमें
फटकारता-सा काम दिन का बाँटता-सा है
अचानक ही हमें बेखौफ़ करती तब
हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही
थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई
पास पा के भी
बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में
उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा
बेरुह इस काले ज़माने में
जब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज़ सूरज
जिन्न-सा पीछे पड़ा
रोज़ की इस राह पर
यों सुबह-शाम ख़याल आते हैं…
आगाह करते से हमें… ?
या बेराह करते से हमें ?
यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी
सुनहली होकर हवा में ख़्वाब लहराती
सिफ़त-से ज़िन्दगी में नई इज़्ज़त, आब लहराती
दिलों के गुम्बजों में
बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी
सुबह की राह के केसरिया
गली का मुँह अचानक चूमती-सी है
कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है
सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते
चले जाते मिलों में मदरसों में
फ़तह पाने के लिए
क्या फ़तह के ये ख़याल ख़याल हैं
क्या सिर्फ धोखा है ?…
सवाल है।

(संभावित रचनाकाल 1948-50, अप्रकाशित)

Literature Desk: updarpan.com

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