सरकार को लेकर चल रही खींचतान में टूटा 3 दशक पुराना साथ

 महाराष्ट्र में सरकार कार को लेकर चल रही खींचतान के चलते अब भाजपा और शिवसेना की तीन दशक पुरानी मित्रता पूरी तरह से टूट चुकी है. असल में भाजपा सूबे में किसी भी कीमत पर बड़े भाई की भूमिका छोड़ना नहीं चाहती थी. जबकि शिवेसना छोटे भाई की भूमिका से खुद को दूर करने की सोच बना चुकी थी.
मिली जानकारी के अनुसार भाजपा का मानना है कि शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने से राज्य में हिंदुत्व की राजनीति की वह अकेले दावेदार बनकर उभारना चाह रही है,और शिवसेना को विपरीत विचारधारा वाले दलों से दोस्ती का खामियाजा भुगतना पद रहा है. ऐसा कहा जा रहा है कि भाजपा शिवसेना का सीएम बना कर सूबे में उसके फिर से बड़ा भाई बनने की संभावना को जीवित नहीं करना चाहती है. जंहा शिवसेना को छोटा भाई बनाने के लिए भाजपा ने करीब छह साल तक लगातार कोशिश को जारी रही है.

वही मिली जानकारी के मुताबिक शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि दूसरी बार छोटे भाई की भूमिका में आने के बाद भविष्य में उसके लिए सूबे में भाजपा का बड़ा भाई बनने की संभावना हमेशा के लिए समाप्त होने वाली है. जिसका यही कारण है कि शिवसेना ने पहले सीएम पद के लिए जिद की और बाद में इस पद के लिए कांग्रेस-एनसीपी से समझौता करने तक से परहेज नहीं किया.
अकेले बढ़ेगी ताकत? सूत्रों के अनुसार भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि सूबे में अकेले आगे बढ़ने से पार्टी की ताकत बढ़ जाएगी. लेकिन शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस से समझौता करने के बाद हिंदुत्व की राजनीति करने वाली वह सूबे में अकेली पार्टी बन चुकी है. एनसीपी-कांग्रेस के साथ शिवसेना को लगातार हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार बचाने के लिए समझौते करने होंगे, जबकि भाजपा ऐसे मुद्दों को लगातार हवा देगी. वैसे भी लोकसभा और विधानसभा के दो-दो चुनावों में शिवसेना से अधिक वोट और सीट ला कर उसने राज्य में खुद के बड़ा भाई होने की धारणा बना चुके है. वही बीते विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव मैदान में उतर कर पार्टी सबसे अधिक सीट से अपनी जगह बना चुकी है.
सरकार लंबी चली तो बढ़ेगी परेशानी; यदि सूत्रों की बात करें तो रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि अगर सरकार चलाने में विवाद नहीं हुआ और कार्यकाल लंबा खिंचा तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है.जो पूरे कार्यकाल तक सरकार चलने पर तीनों दल अगले चुनाव में सीट बंटवारे का फार्मूला भी निकाल देंगे. इससे तीनों दलों की संयुक्त ताकत भाजपा पर भारी पड़ने की स्थिति बन सकती है. नेतृत्व परिवर्तन पर नहीं झुकी भाजपा ऐसा माना जा रहा है कि शिवसेना से मतभेद के दौरान एक अवसर ऐसा भी आया था जब दोनों दलों के बीच समझौता हो सकता है. शिवसेना ने नेतृत्व परिवर्तन की शर्त पर सीएम पद नहीं मांगने का संकेत दिया है. हालांकि भाजपा नेतृत्व ने शिवसेना की मांग को ठुकरा कर अगले आगे बढ़ने का फैसला लिया.