अयोध्या मामले पर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनाया था यह फैसला, तीन हिस्सों में बांटी थी जमीन

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला के हक में निर्णय सुनाया। शीर्ष अदालत ने सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में एक ट्रस्ट बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नई मस्जिद बनाने के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन देने के भी निर्देश हैं  हालांकि इससे पहले अयोध्या विवाद पर बड़ा फैसला 30 सितंबर 2010 को आया था। 

उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की पीठ ने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था। मुस्लिमों, रामलला और निर्मोही अखाड़े के बीच यह जमीन बांटी गई थी। हालांकि पक्षकार इस फैसले से संतुष्ट नहीं हुए और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।  
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 285 पन्नों के अपने फैसले में कई अहम टिप्पणियां की। कोर्ट ने कहा कि यह जमीन एक ऐसा छोटा सा टुकड़ा है, जहां देवता भी पैर रखने से डरते हैं। यह टुकड़ा एक तरह से बारूदी सुरंग की तरह है, जिसे हमने साफ करने की कोशिश की है। जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस धर्मवीर शर्मा  की पीठ ने आगे कहा, ‘हमें ऐसा न करने की सलाह दी गई थी कि कहीं इस बारूद से आपके परखच्चे न उड़ जाएं। मगर जीवन में जोखिम लेने पड़ते हैं। हम वह फैसला दे रहे हैं, जिसके लिए पूरा देश सांस थामें बैठा है।’  
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अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि विवादित स्थल पर मुस्लिमों, हिंदुओं और निर्मोही अखाड़े का संयुक्त मालिकाना हक है। इसके नक्शे को आयुक्त शिवशंकर लाल ने तैयार किया था। उन्हें कोर्ट ने ही नियुक्त किया था। कोर्ट के फैसले के अनुसार तीन गुंबद वाले ढांचे के केंद्रीय गुंबद के नीचे वाला स्थान हिंदुओं को मिला। यहीं रामलला की मूर्ति है। निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरा और सीता रसोई सहित उसका हिस्सा मिला। जिस स्थान पर मुसलमान नमाज पढ़ते थे, इसलिए उन्हें जमीन का तीसरा हिस्सा दिया गया।