राहुल गांधी को इस्तीफा नहीं देना चाहिए, CWC ही बरखास्त कर देना चाहिए


राहुल गांधी ने मन पक्का कर लिया है. वो कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने पर अड़े हैं. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के फिसड्डी प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी के इस्तीफ़ा देने की खबर आई थी. उधर कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) है, जो राहुल को प्रेजिडेंट बनाए रहने पर अड़ी है. इसके पीछे उनका तर्क है. मिसाल के तौर पर CWC के एक सदस्य का बयान सुनिए. जनाब ने कहा, नतीज़े इतने भी खराब नहीं थे.
राहुल इस्तीफ़ा देने की जगह CWC को खत्म कर देंकांग्रेस की जैसी हालत है, उसने उसकी प्रासंगिकता ख़त्म कर दी है. चुनावी राजनीति में उसका ये हाल हो गया है कि होने, न होने के बीच कोई फर्क ही नहीं बचा. अगर राहुल सच में ही कांग्रेस को गुमनाम हो जाने सरीखे भविष्य से बचाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने इस्तीफ़े पर फिर से सोचना चाहिए. उन्हें इस्तीफ़ा देने की जगह CWC को ही खत्म कर देना चाहिए.
कांग्रेस को बीजेपी से सीखना चाहिएकई बार अपने दुश्मन की ताकत को समझना बड़ा काम आता है. बीजेपी चुनावी मशीन है. इसलिए नहीं कि ये कांग्रेस से बेहतर थी. इसलिए भी नहीं कि वो कांग्रेस से बड़ी थी. बल्कि इसलिए कि बीजेपी जानती है, बूढ़े और पुराने पड़ चुके नेताओं से कब पीछा छुड़ाना है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं अटल बिहारी वाजपेयी. हर जगह मान था उनका. तब भी 2004 में सत्ता हासिल नहीं कर पाए. वाजपेयी ने वापसी का रास्ता पकड़ा और लाल कृष्ण आडवाणी ने बागडोर संभाली. अपनी नई टीम के साथ मुस्तैदी से जुट गए. मगर 2009 के चुनाव में मनमोहन सिंह को उखाड़ नहीं सके. इसके बाद बीजेपी ने समीक्षा की. पार्टी ने संगठन के स्तर पर बदलाव किया.
लगातार बदलाव करती रही बीजेपी, लीडर बदलती रही2014 में जब नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी को बहुमत मिला, उस समय पार्टी के अध्यक्ष थे राजनाथ सिंह. उसके कुछ ही समय बाद अमित शाह को अध्यक्ष की कुर्सी मिल गई. आखिरकार शाह ही तो थे, जिन्होंने 2014 का वो कामयाब चुनावी अभियान चलाया था. अध्यक्ष की कुर्सी इसी का तोहफ़ा थी. उसके बाद से बीजेपी का रूप-रंग ही बदल गया. एक के बाद चुनाव जीतती गई वो. ज्यादातर मामलों में बीजेपी को बड़ी ग्रैंड जीत मिली.

आडवाणी और जोशी क्यों हुए रिटायर?बीजेपी ने आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे अपने सारे बड़े नेताओं को सम्मान के साथ रिटायर कर दिया. आडवाणी और जोशी छोटे कद के नेता नहीं थे. इन्होंने पार्टी खड़ी की थी. मगर फिर भी वो शांति से रिटायर हो गए. वजह ये कि पार्टी का हित उनके निजी फायदों से कहीं ऊपर था. 2019 का चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने सबसे पहला काम ये किया कि आडवाणी  के पास जाकर उनके पांव छुए. बीजेपी का बनाया कायदा ऐसा है कि 75 के पार नेता मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा होंगे. इस साल भी कई नेताओं के रिटायरमेंट की बारी है.
हिमंता बिस्वा शर्मा: कांग्रेस का नुकसान बीजेपी का फायदा बन गयाबीजेपी के अंदर पीढ़ियों की इस शिफ्टिंग की एक मिसाल देता हूं. वेद प्रकाश गोयल वाजपेयी सरकार में मंत्री हुआ करते थे. उनके बेटे पीयूष गोयल नरेंद्र मोदी की पहली कैबिनेट का हिस्सा रहे. न केवल सरकार में उनकी अहमियत है, बल्कि संगठन में भी उनकी बड़ी हिस्सेदारी है. कांग्रेस छोड़ने के बाद हिमंता बिस्वा शर्मा बीजेपी के लिए परी की छड़ी बने हुए हैं. उत्तरपूर्व भारत में उन्होंने अलग ही लेवल पर पहुंचा दिया है पार्टी को. वो जब कांग्रेस में थे, तो असम के बड़े कांग्रेसी नेता तरुण गोगोई अपनी ताकत का एक इंच भी उन्हें सौंपने को तैयार नहीं थे. नतीजा ये रहा कि कांग्रेस ने हिमंता को गंवा दिया. आज वही हिमंता अमित शाह की टीम का एक बेहद अहम हिस्सा हैं.
वर्ल्ड कप का मैच और विराट की कप्तानी में सचिन-सहवाग खेलें!अब कांग्रेस का केस देखिए. सोनिया गांधी ने राहुल के लिए अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ी. प्रेजिडेंट तो बदल गया, मगर उसकी टीम नहीं बदली. अब सोचिए. टीम इंडिया वर्ल्ड कप खेलने जाए. कैप्टन तो हों विराट कोहली, मगर टीम में सचिन, सहवाग, युवराज, युसूफ पठान जैसे पुराने खिलाड़ी हों. 2019 के वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की संभावनाएं मजबूत हैं. ऐसा इसलिए कि 2011 की वर्ल्ड कप टीम से बस धोनी ही बचे हैं आज. धोनी भी इसलिए हैं कि वो सफल हैं. परफॉर्म कर रहे हैं और उनका खेल टीम की जीत के लिए ज़रूरी है. इसलिए नहीं कि वन्स अपॉन अ टाइम धोनी अच्छे खिलाड़ी हुआ करते थे.

राहुल अध्यक्ष बन गए, लेकिन इंदिरा के जमाने के नेता CWC में जमे हैंसोनिया गांधी अध्यक्ष पद से चली गईं. मगर उनकी पूरी टीम आज भी CWC का हिस्सा है. टीम नहीं बदली. मोतीलाल वोरा बिना सहारे के ठीक से चल नहीं सकते. उन्हें घर पर आराम करना चाहिए, न कि CWC में बैठकर कांग्रेस की सामूहिक हार पर विचार करना चाहिए. वो क्यों मंजूर करेंगे राहुल का इस्तीफ़ा, जब उनमें खुद ही रिटायर हो जाने की समझ नहीं है? ग़ुलाम नबी आज़ाद, मनमोहन सिंह, ए के एंटनी, अंबिका सोना, मल्लिकार्जुन खड़गे, अशोक गहलोत, ओमान चांडी, आनंद शर्मा, तरुण गोगोई, हरीश रावत, सिद्दारमैया और भी ढेर सारे नेता, जो सोनिया से भी पहले के दौर से हैं. और आज भी CWC में बने हुए हैं.
इनमें से ज्यादातर नेता अपने गढ़ से नहीं जीत सकते अब. वो ज्यादातर समय लूटियन्स दिल्ली में बिताते हैं. किसी तरह पार्टी के अंदर जोड़-तोड़ करके पांच सालों तक अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के फेर में लगे रहते हैं. अमित शाह की कसी हुई चुनावी रणनीति के सामने कहीं नहीं ठहर पाते हैं ये लोग.
कांग्रेस के अंदर राहुल जैसा कौन है दूसरा? 
आज की राजनीति में ‘परिवारवाद’ नाक-भौं सिकोड़े जाने वाला शब्द बन गया है. मगर सच ये है कि कांग्रेस के अंदर एक भी ऐसा नेता नहीं, जिसके अंदर राहुल गांधी जैसी बात हो. कोई भी नहीं, जो राहुल की तरह भीड़ खींच सकता हो. वो भी तब, जब खुद राहुल भी बहुत ज्यादा असरदार नहीं रहे हैं. सोचिए फिर कि बाकी नेता कितने प्रभावहीन होंगे. कांग्रेस पहले भी गांधी परिवार से बाहर के लोगों को नेतृत्व देने का प्रयोग कर चुकी है. वो जानती है कि गांधी परिवार के अलावा कोई और कमान संभाले तो पार्टी बंट जाती है.

मोदी का चेहरा है, मगर अमित शाह की मेहनत भी तो लगी हैमानिए न मानिए, कांग्रेस को साथ जोड़े रखने की गोंद है गांधी परिवार. मगर राहुल गांधी अकेले चुनाव नहीं जीत सकते. हां, ये सच है कि भारत के एक बहुत बड़े हिस्से ने नरेंद्र मोदी को चुना है. उनके नाम पर NDA को वोट दिया है. मगर भूलिए मत कि इस जीत के पीछे अमित शाह की संगठन में की गई रात-दिन की मेहनत का भी हाथ है. उसे कम करके मत आंकिए. उस मेहनत ने इस जीत की स्क्रिप्ट लिखी है. कांग्रेस के पास कोई संगठन ही नहीं बचा है. ये उन लोगों के हाथ में कैद है, जो लोगों के बीच जाकर मेहनत करके, वहां जनाधार बनाने की जगह पार्टी के अंदर खुद को बचाए रखने में खप रहे हैं. ये ऐसे नेता हैं जिनकी हस्ती कांग्रेस से बनी है. जो अपनी पूरी की पूरी ताकत कांग्रेस से पाते हैं, मगर बदले में उसे कुछ नहीं देते.
राहुल को संगठन जिलाना होगाकांग्रेस के अंदर फैसले लेने वाली सबसे बड़ी ताकत है CWC. नेतृत्व बदला है, तो फैसले लेने वाली ताकतों को भी बदलना होगा. वरिष्ठ नेताओं को चाहिए कि वो नए नेतृत्व को राह दिखाएं. यही उनकी आदर्श भूमिका होनी चाहिए. वो CWC का हिस्सा नहीं होने चाहिए. राहुल गांधी के लिए ये मुश्किल होगा. अपनी दादी, अपने पिता के जमाने के नेताओं के साथ सख़्ती से पेश आना यकीनन उनके लिए बेहद मुश्किल होगा. वैसे भी हमारे यहां की संस्कृति ऐसी है कि वरिष्ठों के साथ सख़्ती दिखाना बड़ा मुश्किल हो जाता है. मगर फिलहाल तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती यही है. उन्हें पार्टी को फिर से खड़ा करना होगा. उसे फिर से जिलाना होगा. ये लंबा सफ़र है. इसकी शुरुआत वो CWC से कर सकते हैं.
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