दिल्ली हाईकोर्ट ने EPS पेंशन को लेकर बड़ा फैसला सुनाया, इन कर्मचारियों को मिलेगा सीधा फायदा

हर प्राइवेट कर्मचारी को खुशी तब बढ़ जाती है जब रिटायरमेंट पर अब उन्हें ज्यादा पेंशन मिलने की खबरें आती है.  दिल्ली हाईकोर्ट ने पेंशन को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,   दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 22 मई को सुनाए गए फैसले के मुताबिक में काम कर रहें कर्मचारी या फिर रिटायर्ड हो चुके कर्मचारियों को अब बिना किसी कट ऑफ डेट या सैलरी की सीलिंग लिमिट के . इसके लिए उनकी वास्तविक सैलरी को आधार बनाया जाएगा.आपको बता दें कि एग्जेंप्टेड ऑर्गेनाइजेशन में प्रॉविडेंट फंड (PF) को मैनेज करने के लिए एक ट्रस्ट होता है जबकि अन-एग्जेंप्टेड ऑर्गेनाइजेशन के प्रॉविडेंट फंड को EPFO मैनेज करता है.

इन्हें होगा फायदा- किसी एग्जेंप्टेड ऑर्गेनाइजेशन में अभी जो नौकरी कर रहे हैं या रिटायर हो चुके हैं, दोनों तरह के लोगों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है.

>> अंग्रेजी के बिजनेस अखबार फाइनेंशियल एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मुताबिक रिटायर्ड एंप्लाईज को अपने ट्रस्ट (पूर्व इंप्लॉयर) के पास पीएफ का पूरा पैसा देना होगा.

>> यह राशि सीलिंग अमाउंट के 8.33 फीसदी के बराबर योगदान के बराबर होगा. अब इसके बाद जितनी राशि अधिक मतलब एक्चुअल सैलरी के आधार पर बनती है, उसे ट्रस्ट 6 फीसदी सालाना ब्याज और गेन्स जोड़कर ईपीएफओ के पीएफ फंड को देगा.
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>> इसके बाद ईपीएफओ इस पूरी राशि पर पेंशन कैलकुलेट करेगा.

>> इंप्लाइज पेंशन स्कीम (EPS 95) के तहत 1995 में 5000 रुपये की सीमा निर्धारित की गई थी जिसे 2011 में बढ़ाकर 6500 और 2014 में बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया गया.

क्या है पेंशन स्कीम-अगर आसान शब्दों में समझें तो 15 हजार रुपये तक के वेतन का 8.33 फीसदी और इतनी ही राशि कंपनी की तरफ से मिलाकर इस स्कीम के तहत जमा होता है.

>> 1996 में ईपीएफ 95 के नियमों में एक प्रावधान जोड़ा गया कि कोई भी कर्मी और कंपनी जॉइंट रिक्वेस्ट कर सीलिंग लिमिट से अधिक और वास्तविक वेतन के आधार पर पीएफ में योगदान कर सकता है.

>>  कट-ऑफ डेट का मामला क्या है- केंद्र सरकार ने 1 सितंबर 2014 के बाद से इंप्लायज पेंशन स्कीम की सीलिंग 6500 रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया. इसके तहत 6500 रुपये से अधिक के वेतन पर कांट्रिब्यूट करने पर एंप्लायर और एंप्लायी दोनों को संयुक्त तौर पर आवेदन करना था.

>> इसके लिए 1 सितंबर 2014 से छह महीने का समय दिया गया था जिसे पीएफ ऑफिस 6 महीने और बढ़ा सकती थी. लेकिन इस अवधि तक यदि इस विकल्प का चयन नहीं किया गया तो 6500 रुपये से अधिक योगदान राशि को पीएफ खाते में ब्याज के साथ जमा करा दिया जाएगा. हालांकि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की योजनाओं में कट-ऑफ डेट की जरूरत नहीं है.
प्राइवेट कंपनियों दो तरीके से पीएफ और पेंशन फंड को मैनेज करती है.

1. छूट कंपनियां-ये कंपनियां पीएफ का पैसा अपने पास रखती हैं. यह कर्मचारी के वेज लिमिट 15,000 रुपये का 12 फीसदी होता है. कंपनी की 12 फीसदी हिस्सेदारी में 8.33 फीसदी पेंशन फंड में जाती है जो सीधा ईपीएफओ को चला जाता है. इसका मतलब है कि ये कंपनियां बाकी 3.66 और कर्मचारी की 12 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास रखती हैं.

2. गैर-छूट कंपनियां-इनमें पीएफ का पूरा पैसा सीधे ईपीएएफओ के पास चला जाता है.