पुनर्जन्म की कहानी से जुड़ी है, हिंदू धर्म की गाथा

पुनर्जन्म वह दार्शनिक या धार्मिक अवधारणा है जिसके मुताबिक आत्मा ,शरीर के मरने के बाद दुसरे शरीर में एक नया जीवन शुरू कर सकती है | ये अवधारणा हिन्दू धर्म की एक मुख्य विचारधारा है | बोद्ध धर्म के दुबारा जन्म की अवधारणा को भी पुनर्जन्म कहा जाता है और प्य्थाग्रोस , प्लेटो और सोक्रेटस जैसी एतिहासिक हस्तियाँ भी इस विचार में विश्वास रखती थीं | ये कई पुराने और आधुनिक धर्म जैसे अध्यात्म, ब्रह्मविद्या, और एकांकर का भी हिस्सा है और पूर्वी एशिया , साइबेरिया , दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के कई जगहों में मोजूद जातियों का भी अभिन्न अंग हैं ।




हांलाकि यहूदी, ईसाई और इस्लाम के अब्राहमिक धर्मों के अधिकतर गुट नहीं मानते की व्यक्ति पुनर्जन्म ले सकता है , लेकिन फिर भी इनमें कुछ गुट हैं जो पुनर्जन्म को मान्यता देते हैं ; इन गुटों में शामिल हैं काब्बालाह , कैथर , द्रुज़े और रोजीक्रूशनस के इतिहासिक और समकालीन शिष्य | पिछले कुछ दशकों में कई यूरोप और उत्तर अमेरिका के लोगों ने अभी पुनर्जन्म में रूचि दिखाई है | समकालीन फिल्मों , किताबों ,और लोकप्रिय गानों में भी कई बार पुनर्जन्म का ज़िक्र होता है ।

पुनर्जन्म यानि “रीन्कार्नाशन” लैटिन भाषा से उभरा है जिसका मतलब है “दुबारा शरीर में प्रवेश” | इसी तरह एक ग्रीक शब्द जो आम तौर पर इस्तेमाल होता है वह है पल्लिनजेनेसिस जिसका मतलब है “फिर से जन्म लेना”| पली और संस्कृत जैसी पारंपरिक भाषाओँ में “रीबिर्थ ” “ट्रांस्मैग्राशन””मेटाप्स्य्कोसिस” या “रीन्कार्नाशन” जैसे अंग्रेजी शब्दों से मेल खाता कोई शब्द नहीं है | ये सम्पूर्ण प्रक्रिया जो मृत्यु , जन्म और पुनर्जन्म की प्रणाली को सम्भव करती है उसको कर्म चलाता है और उसका नाम है समसार , जबकि वो दशा जिसमें एक व्यक्ति जन्म लेता है उसको हम जन्म (जती) का नाम देते हैं | देवता (भगवान) भी मर कर फिर जन्म लेते हैं | यहाँ पुनर्जन्म शब्द पूरी तरह से लागू नहीं होता है , फिर भी हिन्दू भगवानों ने पुनर्जन्म लिया है | भगवान विष्णु अपने दस अवतारों के लिए जाने जाते हैं |कई ईसाई लोग येशु को एक अलोकिक अवतार मानते हैं | कई ईसाई और मुस्लिम मानते हैं की कुछ पैगम्बर दुबारा जन्म लेंगे | कुछ ईसाई लेकिन ये मानते हैं की येशु फिर से दुनिया के ख़तम होने के समय से पहले जन्म लेंगे हांलाकि इसे पुनर्जन्म नहीं मानते हैं |
पुनर्जन्म के इस विचार के जन्म का मूल अभी अस्पष्ट है | इस विषय पर बातचीत भारत की दार्शनिक परम्पराओं(सिन्धु घाटी शामिल) में दिखाई देती है | सोक्रेटस के समय से पूर्व ग्रीक भी पुनर्जन्म के मुद्दे पर बातचीत करते थे और अपने समय के सेल्टिक ड्र्यूड भी पुनर्जन्म का पाठ पढ़ाते थे | पुनर्जन्म से जुड़े विचार कई क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से उभरे होंगे या सांस्कृतिक संपर्क के माध्यम से विश्व भर में फ़ैल गए होंगे | सांस्कृतिक संपर्क का समर्थन करने वाले सेल्टिक , ग्रीक और वैदिक विचारधाराओं और धर्म में सम्बन्ध ढूंढ रहे हैं , और कुछ तो ये भी कहते हैं की पुनर्जन्म में विश्वास प्रोटो-इंडो-यूरोपीय धर्म में भी मोजूद था ।
१९ सदी तक दार्शनिक स्चोपेनहौएर और नीत्ज्स्चे पुनर्जन्म की धारणा आर बहस करने के लिए भारतीय ग्रंथों का इस्तेमाल कर पा रहे थे | शुरुआती २० सदी में पुनर्जन्म में रूचि मनोविज्ञान की शुरुआती शिक्षा का हिस्सा थी , खास तौर से विलियम जेम्स के प्रभाव की वजह से जिन्होनें मन के दर्शन, तुलनात्मक धर्म, धार्मिक अनुभव के मनोविज्ञान और अनुभववाद की प्रकृति के विचारों को सबके सामने पेश किया |इस समय पुनर्जन्म की धारणा की लोकप्रियता को थियोसोफिकल सोसाइटी के व्यवस्थित और सवतसुलभ भारतीय अवधारणाओं की शिक्षा ने और द गोल्डन डौन जैसी समितियों के प्रभाव से बढ़ावा मिला | प्रसिद्द शक्सियत जैसे एनी बसंत , डब्लू .बी .यीट्स और डीओं फार्च्यून ने इस विषय को पूर्वी संस्कृति से ज्यादा पश्चिम संस्कृति का एक अभिन्न अंग बना दिया | १९२४ तक ये विषय बच्चों की किताबों में मजाक का विषय बन गया।
वर्जिनिया विश्विद्यालय के मनोवैज्ञानिक इआन स्टीवेंसन ने कई ऐसे छोटे बच्चों की जांच की जिन्हें अपनी पिछली ज़िन्दगी याद थी | उन्होनें ४० सालों के भीतर करीब २५०० ऐसे मामलों की जांच की और 12 किताबें छापीं जिनमें शामिल थीं ट्वेंटी केसेस सज्जेस्टिव ऑफ़ रीन्कार्नाशन और वेयर रीन्कार्नाशन एंड बायोलॉजी इन्टेर्सेक्ट | स्टीवेंसन ने बड़े ही व्यवस्थित तरीके से हर बच्चे के कथन लिखे और फिर जिस मरे हुए व्यक्ति की बच्चे ने पहचान की उसको ढूँढा , और फिर बच्चे की याद से मरे हुए व्यक्ति के जीवन के तथ्यों का मिलाप करवाया | रीन्कार्नाशन और बायोलॉजी में उन्होनें जन्म के निशानों और दोषों को मृत व्यक्ति की चोटों से मिलाया , और शव परिक्षण की तस्वीरों जैसे मेडिकल रिकॉर्ड के माध्यम से इन तथ्यों की पुष्टि की |और लोग जिन्होनें रीन्कार्नाशन क्षोध में भाग लिया वह हैं जिम बी टकर ,अन्तोनिया मिल्स , सतवंत पसरीचा , गोडविन समररत्ने और एरलेंदुर हराल्द्सन | पॉल एडवर्ड्स जैसे शंकालुओं ने इन सब मामलों का विश्लेषण किया और उन्हें हकीकत से परे माना , और साथ में ये भी कहा है की पुनर्जन्म के सबूत इन्सान के अपने डर और सोच से जन्मी झूठी यादों और चयनात्मक सोच का नतीजा है और इसलिए इसे पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता है |
पिछले कई दशकों में पश्चिम में कई लोगों ने पुनर्जन्म के विषय में रूचि दिखाई है | लोकप्रिय किताबें जैसे द रीन्कार्नाशन ऑफ़ पीटर प्राउड , डेड अगेन , कुंडून , फ्लूक , व्हाट ड्रीम्स मई बिकम,द मम्मी,बिर्थ ,चांसेस आर और क्लाउड एटलस और समकालीन लेखक जैसे कैरोल बोमन और विक्की मच्केंज़ी की किताबें पर आधारित फिल्में और कई लोकप्रिय गाने पुनर्जन्म पर आधारित हैं ।
शंकालू कार्ल सगन ने दलाई लामा से पुछा की वह क्या करेंगे अगर उनके धर्म के एक मौलिक सिद्धांत (पुनर्जन्म) को विज्ञान नामंजूर कर देता है | दलाई लामा ने जवाब दिया “ अगर विज्ञान पुनर्जन्म को नामंजूर कर देता है तो तिब्बती बौध धर्म भी पुनर्जन्म को त्याग देगा …..पर पुनर्जन्म को नामंजूर करना बहुत मुश्किल होने वाला है”।
इआन स्टीवेंसन ने ये बताया है की ईसाई धर्म और इस्लाम को छोड़ अन्य सभी प्रमुख धर्मो के लोग पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं | इसके इलावा पश्चिमी देशों के २० से ३० प्रतिशत लोग जो ईसाई धर्म के हैं वह भी पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं |