Cimap वैज्ञानिकों ने जिरेनियम की व्‍यावसायिक खेती के लिए की नई तकनीक विकसित

लखनऊ। जिरेनिमय की खेती को व्‍यावसायिक रूप से बढ़ावा देने के लिए सरकार और Cimap वैज्ञानिकों ने अपने प्रयास तेज कर दिये हैं। जिरेनिमय को सगंध पौधों की खेती के जरिए किसानों की आमदनी बढ़ाने वाले एरोमा मिशन में शामिल किया गया है। अभी तक जिरेनियम की पौधे से पौध तैयार की जाती थी लेकिन इसकी पौध बारिश के सीजन में बर्बाद हो जाती थी जिससे किसान को पौध सामग्री काफी महंगी पड़ जाती थी। अब लखनऊ स्‍थित Cimap के वैज्ञानिकों ने डॉ. आलोक कालरा और डॉ. सौदान सिंह की अगुवाई में जिरेनियम की नई तकनीकी विकसित की है जिससे अब तक करीब 35 रुपए की लागत वाला पौधा सिर्फ 2 रुपए में तैयार हो सकेगा।

इस टीम के सदस्य रहे सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. अनिल सिंह बताते हैं, “जिरेनियम का पौधा पौधे से बनता है। समस्या ये है कि बारिश में पौधे मर जाते है। इसलिए प्लांटिंग मैटेरियल (पौध) बचाना बड़ी समस्या थी, सीमैप में भी अब तक इसे वातानिकुलित ग्लास हाउस में बचाया जाता था, लेकिन अब हम लोगों ने पॉलीहाउस की सुरक्षात्मक शेड तकनीकी विकसित की है। जो किसान के खेत पर ही काफी सस्ती लागत में बना दिया जाता है।’ सीमैप के प्रक्षेत्र में लगी पौध को दिखाते हुए डॉ.अनिल कहते हैं, “सेमी प्रोटेक्टिव शेड पॉलीथीन का वो सुरक्षित शेड होता है, जहां बरसात का पानी न भरे, बारिश का पानी सीधे पौधों पर न पड़े। एक एकड़ खेती के लिए करीब 4 हजार पौधे बचाने होते हैं। इसके लए 50-60 वर्ग मीटर का पॉली हाउस बनाना होता है। जिसमें करीब 8-10 हजार रुपए का खर्च आता है।’ जिरेनियम के पौधे से निकलता तेल काफी कीमती होता है। भारत में इसकी औसत कीमत करीब 20 हजार रुपए प्रति लीटर है। यूपी, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पूर्वी यूपी में इसकी खेती होती है। दोमट और बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त है। यूपी के संभाल, बदायूं, फतेहपुर समेत कई जिलों में नई विधि से सफल खेती हो रही है। इसके तेल का प्रयोग एरोमा थेरेपी, सौंदर्य प्रसाधन, स्वादगंध और दवा के क्षेत्र में होता है। इसका वैज्ञानिक नाम पिलारगोनियम ग्रेवियोलेन्स है, ये मूलरुप से अफ्रीका का पौधा है।

बरसात में बचाए गए पौधों से अक्टूबर महीने से नर्सरी तैयार करनी शुरु कर दी जाती है। वैसे तो इसकी खेती नवंबर से लेकर फरवरी तक किसी महीने में की जा सकती है लेकिन सीमैप के वैज्ञानिक फरवरी को सही समय मानते है। एक एकड़ खेत के लिए 20 हजार से 22 हजार पौधों की जरुरत होती है। एक मदरप्लांट से 10-12 कटिंग कर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। पौधे को गांठ के पास से ब्लेड से काटकर अलग-अलग लगाते जाते हैं और नर्सरी तैयार होती जाती है। डॉ. सौदान सिंह बताते हैं, “अगर मेंथा के समय (फरवरी-मार्च) में इसकी खेती की जाए तो किसान के लिए ये उससे ज्यादा अच्छी फसल है। इसमें 30 फीसदी तक पानी कम लगता है। पौध तेजी से बढ़ती है। नर्सरी में 20-25 दिन में तैयार हो जाती है। इसे पशु भी नुकसान नहीं करते हैं। किसान पौध के लिए सीमैप संपर्क कर सकते हैं।’

डॉ. सौदान सिंह बताते हैं, “अगर मेंथा के समय (फरवरी-मार्च) में इसकी खेती की जाए तो किसान के लिए ये उससे ज्यादा अच्छी फसल है। इसमें 30 फीसदी तक पानी कम लगता है। पौध तेजी से बढ़ती है। नर्सरी में 20-25 दिन में तैयार हो जाती है। इसे पशु भी नुकसान नहीं करते हैं। किसान पौध के लिए सीमैप संपर्क कर सकते हैं।’ जिरेनियम के मातृ पौधों को बचाने के लिए तैयार किए जाने वाले शेड को किसान के पास मौजूद बांस बल्ली की मदद से 200 माइक्रोन की पारदर्दी (सफेद) पॉलीथीन से तैयार किया जाता है। जिसमें के ऊपर का एक मीटर हिस्सा खुला रखा जाता है ताकि ऊपर बारिश के पानी से तो बचत हो लेकिन पौधे के लिए हवा का आवागमन बना रहे। प्राकृतिक माहौल में पौधे तेजी से विकसित होते हैं। इसे खेत के उस हिस्से में बनाया जाता है जो ऊंचा हो। या फिर उस जगह को एक फीट मिट्टी डालकर ऊंचा कर देते हैं।

सीमैप के मुताबिक पहले की महंगी तकनीकी में एक पौधे की लागत 30-35 रुपए आती थी,जबकि बचते थे सिर्फ 85 फीसदी पौधे लेकिन नई विधि में 95 फीसदी तक पौधे की बचत होती है और लागत प्रति पौध सिर्फ 2 रुपए ही आती है। पौध की लागत कम होने से इसे आम किसान भी लगाने लगे हैं। मेंथा की फसल अब तक यूपी समेत कई राज्यों के लिए कमाई देने वाली फसल साबित होती रही है। वर्ष 2018 में भी 1200 से लेकर 1800 रुपए तक मेंथा का तेल बिका है। लेकिन 90 दिन की मेंथा की फसल में 8 से 11 सिंचाई और काफी निराई गुड़ाई की जरुरत पड़ता है। पानी की ज्यादा खपत के चलते काफी मेंथा की खेती पर सवाल उठने लगे थे। ऐसे में सीमैप के वैज्ञानिक पानी के संकट वाले इलाकों में मेंथा की जगह जिरेनियम की फसल लगाने की सलाह देते हैं।

Courtsey – GaonConnection

The post Cimap वैज्ञानिकों ने जिरेनियम की व्‍यावसायिक खेती के लिए की नई तकनीक विकसित appeared first on updarpan.com.