लोकसभा चुनाव: पत्थरबाजों के साथ हमदर्दी दिखने वाली महबूबा चारों खाने चित्त, घाटी में भाजपा को तीन सीट

श्रीनगर: जम्‍मू कश्‍मीर में आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार की कार्रवाई का विरोध करने वाली पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती राजनितिक अखाड़े में चारों खाने चित्‍त हो गई हैं. राज्य में बालाकोट बनाम 35ए पर जुबानी जंग और पत्‍थरबाजों की पैरवी भी महबूबा मुफ्ती को संसद की दहलीज तक पहुंचाने में विफल रही. 2019 लोकसभा चुनाव में महबूबा मुफ्ती न सिर्फ खुद चुनाव हार गई, बल्कि उनकी पार्टी पीडीपी भी सूबे में एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी. 
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वहीं, राज्य में सैन्‍य कार्रवाई का विरोध कर अलगाववादियों और आतंकियों से हमदर्दी दिखाने वाले फारुख अब्‍दुल्‍ला की नेशनल कांफ्रेंस ने जम्‍मू कश्‍मीर की राजनीति में एक बार फिर से वापसी की है. इस बार फारुख अब्‍दुल्‍ला न सिर्फ खुद श्रीनगर से चुनाव जीतने में सफल रहे हैं, बल्कि उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के प्रत्याशी अनंतनाग और बारामूला से चुनाव जीतकर संसद तक पहुंचने में सफल हुए हैं. इसके उलट, भाजपा ने लगभग इन्‍हीं मुद्दों के दूसरे पहलू पर घाटी की जम्‍मू, ऊधमपुर और लद्दाख सीट पर जीत हासिल की है. 
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जम्‍मू और कश्‍मीर विधानसभा के लिए 2014 में चुनाव के बाद पीडीपी ने भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी. सरकार बनने के ठीक बाद, घाटी में फैले आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली केंद्र सरकार ने कश्‍मीर में ऑपरेशन ऑल आउट चलाया था. गठबंधन के कारण सूबे की सीएम महबूबा मुफ्ती ऊपर से इस ऑपरेशन का साथ दे रहीं थीं, लेकिन अंदर से वह अर्धसैनिक बलों पर पत्‍थर फेंकने वालों के साथ खड़ी हुई थी. इन्‍हीं पत्‍थरबाजों से हमदर्दी के कारण महबूबा मुफ्ती को अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी.