लखनऊ। पहले डंडा अब झंडा। जी हां खाकी उतारने के बाद डीजीपी से कांस्टेबिल तक में खादी पहनकर खाकीधारियों में जनसेवा करने का उतावलापन देखते बन रहा है। डीजीपी एडीजी और डीआईजी रहे आधादर्जन से ज्याद रिटायर्ड आईपीएस अधिकारियों को राजनीति में मिली कामयाबी के बाद खाकी उतरने के बाद खाकी बैठे पुलिस अधिकारियों ने सियासी पार्टियों का दामन थामना शुरू कर दिया है। डीजीपी यशपाल सिंह,बृजलाल एके जैन के बाद हाल ही में डीजीपी (होमगार्ड) सूर्य कुमार शुक्ला ने भाजपा ज्वाइन की है।

इन सबने खादी पहनकर जनसेवा करने का संकल्प दोहराया है। बृजलाल, एकजैन के बाद शुक्ला तीसरे डीजीपी है। जिन्होंने भाजपा का झंडा उठाया है। हालांकि  जैन से पहले यशपाल सिंह और बृजलाल को अभी किसी सदन में जाने का मौका तो नहीं मिला। लेकिन बृजलाल को प्रदेश की भाजपा सरकार ने एससीएसटी कमीशन का चेयरमैन बनाकर उन्हे राज्यमंत्री का दर्जा दे रखा है। हालांकि इससे पूर्व प्रदेश के अन्य डीजीपी रहे श्रीश चन्द्र दीक्षित को जरूर भाजपा से १९९१ में सांसद रहे। श्री दीक्षित १९६४ से १९६७ तक वाराणसी के एसएसपी भी रहे। तत्कालीन सपा सरकार में डीजीपी रहे यशपाल सिंह ने २०१२ के विधानसभा चुनाव से पहले अप्रैल २०११ में पीस पार्टी का दामन थामा था। हालांकि उनकी पत्नी गीता सिंह पहले से ही समाजवादी पार्टी से गोडा के बलरामपुर से विधायक रही।

चाहकर भी यशपाल सिंह को सपा में इंट्री नहीं मिली तो उन्होंने पीसपार्टी ज्वाइन तो की। लेकिन उन्हे राजनीतिक कुछ खास रास नहीं आई। प्रदेश में एडीजी रहे महेन्द्र सिंह यादव जो पूर्व मु ससचिव नीरा यादव के पति थे। ने भी रिटायर होने के बाद राजनीति में हांथ आजमाया तो कामयाबी हांथ लगी। वे न सिर्फ विधानसभा पहुंचे बल्कि भाजपा सरकार में शिक्षा विभाग के कैबिनेट मंत्री भी बने। भाजपा के सत्ता से बेदखल होने के बाद उन्होंने रालोद का दामन थाम लिया। प्रदेश के अन्य एडीजी रहे अजय सिंह ने रिटायरमेंट के बाद जनसेवा करने की गरज से कांग्रेस का दामन थामा लेकिन अभी उन्हे चुनाव मैंदान में जाने का अवसर नहीं मिला। केरल के एडीजी रहे राजबहादुर भी लखनऊ की सरोजनीनगर विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना भाग्य आजमाया लेकिन सफलता हांथ नहीं लगी। जबकि डिप्टी एडीजी रहे मंजूर अहमद ने कांग्रेस और बसपा दोनों दलों में रहकर मेयर और विधायकी का चुनाव लड़ा और दोनों चुनावों में शिकस्त का सामना करना पड़ा।
एडीजी रहे मनोज कुमार सिंह भी २०११ में कांग्रेस में शामिल हुए। लेकिन चाहने के बाद भी उन्हे टिकट नहीं मिला। कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं से उनके करीबी संबंध रहे। एडीजी सुब्रत त्रिपाठी किसी दल में शामिल होने के बाद मनुवादी पार्टी बनाई। चुनावी राजनीति में न सही लेकिन अपनी पार्टी के जरिए वे राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता बनाए हुए है। आईजी रहे एसआर दारापुरी भी काफी दिनों सक्रिय है। राबटर््सगंज से सांसदी और उससे पूर्व शाहाबाद से विधायकी का चुनाव भी लड़े लेकिन सफल नहीं हुए। आल इंडिया पीपुल्स फं्रट से बावस्ता दारापुरी राजनीतिक गतिविधियों में अभी भी सक्रिय है। तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार में पुलिस महानिरीक्षक रह चुके अमरदत्त मिश्र ने रिटायर होने के बाद पिछला विधानसभा चुनाव में भदोही से लड़ा लेकिन पराजित हुए। जबकि डीआईजी रहे सीएम प्रसाद सोनभद्र की दुद्वी विधानसभा से जीतकर विधानसभा पहुंचे।

सदनों में रिटायर्ड खाकीधारियों की इन्ट्री या दिलचस्पी कोई नई बात नहंी है। विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष रहे और सपा सरकार में मौजूद कैबिनेट मंत्री अहमद हसन रिटायर होने के बाद से चुनावी राजनीति में सक्रिय है। यूपी कैडर के एक आईपीएस अधिकारी जो यहां के कई जिलों में कप्तान रहे दावा शेरपा राजभवन में एडीसी भी रहे को पुलिस की नौकर रास नहीं आई तो अपने गृहराज्य मेघालय चले गए दार्जिलिग से चुनाव लड़े और शिकस्त खाकर बैठ गए। मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल यूपी मे आकर बागपत से आकर भाजपा से चुनाव लड़े और रालोद अजित सिंह को पराजित कर लोकसभा पहुंच गए। फैजाबाद के एसएसपी रहे डीबी राय भाजपा के टिकट से दो बार लोकसभा पहुंच चुके है।
सपा सरकार में एसटीएफ से इस्तीफा देकर पीपीएस अधिकारी शैलेन्द्र सिंह ने चंदौली ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी कांग्रेस से शुरू की। सीआरपीएफ में आई जी रहे वीवीएस पवार ने रालोद और एडीजी बीजेन्द्र सिंह और डीआईजी केके तिवारी सरीखे नेताओं ने चुनाव के दौरान पीस पार्टी ज्वाइन की लेकिन चुनावी खुमारी उतरने के साथ ही राजनीति करने का जज्बा भी जवाब दे गया।   नेताओं के साथ सुरक्षाकर्मी रहे लोगों ने भी राजनीति में हांथ आजमाया और सफल रहे।
सपा बसपा से सांसद विधायक रहे उमाकांत यादव पुलिस की नौकरी से बर्खास्त होने के बाद राजनीति में आए तो उन्हे अपेक्षित सफलता मिली। मुलायम सिंह यादव के सुरक्षाकर्मी रहे प्रो.एसपी सिंह बघेल पहले लोकसभा फिर राज्यसभा में रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी बसपा  से शुरू की थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सुरक्षा में रहे कमल किशोर कमांडों कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा में अपनी आमद दर्ज करा चुके है। जब कि राजधानी के कोतवाली हजरतगंज के एक सिपाही रामहर्ष यादव ने समाजसेवा के लिए राजनीति का रास्ता चुनने के लिए नौकरी से इस्तीफा दिया और मानवता समाज पार्टी बनाकर राजनीति में सक्रिय हो गए।